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समाजिक आंदोलन कि शुरुआत मे विरोध होना लाजमी है


मधुबनी जिला पदाधिकरी कभी साइकिल पर चल रहे है कभी मोटरसाइकिल रैली मे बॉडीगार्ड को लेकर सफर कर रहे है कभी पैदल मार्च तो कभी लम्बा मैराथन दौर.आम लोग समझ रहे है जिला पदाधिकरी अपना ड्यूटी कर रहे है ,विरोधी समझ रहे है नीतीश कुमार अपना राजनीतिक गोटियां सेक रहे है ,इसलिए विरोधी इस मानव शृंखला को विफल करने मे जुटा है .जनता जाति और राजनीतिक उलझन की जकड़न मे कैद होकर रह गया है . लेकिन इस सबके बीच सवाल बड़ा है आखिर दहेज के विरुद्ध इस मानव शृंखला की क्या जरूरत है ? सवाल यह भी है क्या इस मानव शृंखला के बनने से दहेज लेना देना,बाल विवाह दहेज हत्या रुक जायेगा ? आम जनता शायद यही कहेगी इससे कूछ नहीँ होगा ,इस शृंखला से जनता का समय और पैसा दोनो बरबाद होगा लेकिन शिक्षित वर्ग जब इस शृंखला का विरोध करते है तो मुझे राजा राममोहन राय का इतिहास याद आने लगते है. मैं सोचने लगता हूँ दो सौ वर्ष पूर्व राजा राममोहन राय ने सती प्रथा बाल विवाह और विधवा विवाह जैसे मुद्दे को उठाया होगा तो उनका क्या हश्र हुआ होगा .उनके पास ना जिला पदाधिकरी ना साइकिल रैली था,उनके पास पुलिस का इतना बड़ा जथ्था भी नहीँ था उनके पास यदि कूछ था तो वह था विरोध ,पाखंडी विरोध कर रहे थे ,प्रतिद्वंदि विरोध कर रहे थे ,ब्राह्मणवादी विचारधारा के लोग विरोध कर रहे थे ,हिंदूवादी प्रोपगेंडा फैला रहे थे और इस विरोध के वावजूद उन्होने सती प्रथा जैसी कुरीति को समाप्त करके ही दम लिया और इसी कारन अंग्रेज उन्हें आधुनिक भारत का जनक कहते थे . उस वक्त हिंदुस्तान मे मुगल हुकूमत अंतिम दौर मे थी देश मे अँग्रेजी हुकूमत शासन कर रही थी और भारतीय महिलायों को सती प्रथा के नाम पर जबरन जिंदा जलाया जाता था लेकिन अँग्रेजी हुकूमत ने भारतीय महिलाओं के दर्द को समझा, राजा राममोहन राय के आंदोलन को समझा और सती प्रथा जैसी कुरीति को जड़ से मिटा दिया .

लेकन आज जब भारत आजाद हो चुका है भारतीयों की अपनी सरकार है और किसी नेता ने हिम्मत करके समाजिक आंदोलन किया है तो उसका विरोध समाजिक संक्रिनता को दर्शाता है .विरोधियों ने शायद कभी विवाहिता की अर्थी को नहीँ देखा होगा , विरोधियों ने शायद कभी शादी के मेंहदी लगे हाथों को अर्थी पर नहीँ देखा होगा .विरोधी नहीँ चाहते है दहेज की बली बंद हो ,मैं अक्सर पोस्टमार्टम हाउस मे माँ बाप ,भाई ,बहन को उन लाशों से लिपटकर रोते हुए देखा है.मैं ने विवाहिता को शादी के जोरों मे लिपटे हुए लाश को देखा है कलेजा काँप उठता है ,लाल जोड़ा मे लिपटा हुआ लाश को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे नयी नवेली दुल्हन अभी अभी ससुराल पहुँची है ,पर अफसोस यह लाल जोड़ा उसके लिये मौत का सौगात बन गया रहता है .यह दृश्य विचलित कर देती है, कैमरा थरथराने लगता है मुँह छुपा कर आँखों से बहते आँसू को पोंछकर निकलता हूँ और भगवान से दुआ करता हूँ हे भगवान मुझे बेटी मत देना और यदि बेटी दोगे तो ऐसा दामाद मत देना .साथ ही दुआ करता हूँ हे परमात्मा मेरे दुश्मन को भी ऐसा दिन मत दिखाना .और आज जब किसी राजनेता ने दहेज के विरुद्ध ,बाल विवाह के विरुद्ध समाजिक चेतना जगाने का प्रयास किया है तो उसका सराहना और सहयोग करना चाहिये .यदि किसी नेता ने मानव शृंखला बना कर समाजिक कुरीतियों का विरोध किया है तो हम सिर्फ यह कहकर नहीँ बच सकते है की इससे कोई फायदा नहीँ है .समाजिक कुरीति समाज के जगरूक होने पर समाप्त होता है ना की मीन मेख निकालने से होता है . मैं नीतीश कुमार को राजा राममोहन राय बनाने को नहीँ कह रहा हूँ पर एक और दहेज की बली रोकने मे आपका सहयोग की अपेक्षा जरूर करता हूँ .

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