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बूढ़े पिता के सामने जंजीर में बंधा रहता है सरोज, मदद की है दरकार


बिन्देश्वर चौधरी : कहते हैं जब तक़दीर रुठ जाती है और परिस्थिति करवट लेती है तो इंसान वह काम भी करने पर मजबूर हो जाता है जो उसने कभी सोचा भी नहीं होता है. ऐसे ही दुर्भाग्य की सच्चाई का नाता अंधराठाढ़ी थाना क्षेत्र के देवहार बिदुलिया गांव के बुजुर्ग पीताम्बर झा और उनके पुत्र सरोज कुमार (35) से जुड़ी हुआ है. यह उस पिता का दुर्भाग्य ही है की एक बाप अपने एकलौते बेटे और एक पत्नी अपने सुहाग को जंजीर में बांधकर रखने को विवश है. मामला अंधराठाढ़ी थाना क्षेत्र के देवहार बिदुलिया गांव का है. जहां कभी सामान्य रूप से जीवन यापन करने वाला सरोज कुमार झा (35) अब अपने परिवार और समाज के लिए विवशता का बोझ बन गया है. सरोज की मानसिक हालत विगत दो वषों से ठीक नहीं होने के कारण घरवाले उसे बांध कर रखने को विवश हैं. उसका परिवार मजबूर, असहाय और असमंजस में है. खुला रखने में पर वह गांव टोले में उत्पात मचाता है. जंजीर में बांध कर रखने से ममता रोकती है और कानूनी लफड़ा का भय है. 

क्या हुआ था 
सरोज के पिता पीताम्बर झा ने बताया कि दो साल पहले तक सरोज बिलकुल ठीक था. वह दिल्ली के एक प्राइवेट प्रिंटिंग प्रेस में कार्यरत था. कुछ समय तो सबकुछ ठीक रहा उसके बाद अचानक ही मनोरोगी बन गया. नौकरी भी छूट गयी. बाद में किसी तरह वह गांव पंहुचा. पता चला कि गलत सत्संग में वह वहा भांग गांजा और शराब का हद से ज्यादा सेवन करने लगा था. 

पत्नी और पिता की त्रासदी है उसे बांध के रखना पड़ता है जबकि ममता उसे बंधा नहीं देख पाती. कानूनी तौर से ये एक अपराध भी है. मगर खुला रहने पर टोला गांव में काफी उत्पाद मचाता है. इस बुढापे में पीताम्बर झा खुद छोटी सी दुकान चलाकर राशन पानी और दवाई का इंतजाम करते है. पत्नी ज्योती देवी दिन भर काम में डूबी अपने नसीब पर आंसू बहाती रहती है. ज्योति का सपनो का सहारा अब उसके बच्चे बेटा सागर (10) और बेटी मानसी कुमारी (7) ही है. बच्चे भी डर और भय के साए में पलने को मजबूर हैं. 

क्या है हालात
पीताम्बर झा ने बताया कि कुछ दिन पहले उसने सरोज को रांची मनोरोग चिकित्सालय में भर्ती कराया था. मगर कुछ दिनों के बाद अस्पताल ने भी उसे वापस घर भेज दिया. विगत डेढ़ दो वर्षो से सरोज को दिल्ली, रांची, दरभंगा, नेपाल आदि अनेक शहरो में इलाज करवाने के लिए दर-दर भटक रहे है. इलाज़ के चक्कर में जमीन भी बिकती जा रही है लेकिन सरोज की मानसिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हो पाया है. पिता फिर से सरोज को मनोरोग चिकित्सालय रांची में भर्ती करने के प्रयास में है.


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एक बूढ़ा बाप अपने बुढ़ापे के एकलौते पुत्र को अपने आंखो के सामने पथरायी आंखो से देखने की विवशता के साथ अफसरों, नेताओं व सामाजिक संस्थाओं से मदद की गुहार लगा हैं, लेकिन इस मजबूर परिवार को अभी तक ना तो कोई राजनेता, न ही कोई अफसर और ना कोई स्वंयसेवी संस्था मदद के लिए आगे आई है. 

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