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एक कमरे मे पंद्रह से बीस जिंदगी गुजारने वाले को भी सोशल डिस्टेंस का पाठ पढ़ाना कहां तक सही है?



न्यूज़ डेस्क पटना 

दो गज दूरी मास्क है जरूरी सरकार का नारा है और अमलीजामा पहनाने के लिए लाठियां चटकायी जा रही है । मुझे याद है महानगर दिल्ली मे बिताए वह दिन जब एक शौचालय का इस्तेमाल बिल्डिंग मे रहने वाले हर कोई करता था। बात 2000-2001 की है जब मैं दिल्ली मे था। दिल्ली मे उतनी भीड़ नही थी लेकिन एक कमरे मे पांच जना रहते थे ताकि किराया का भार अधिक ना पड़े। दस बाई आठ का कमरा मे खाना  बनाने का जगह और कपड़े रखने का जगह भी बनाया हुआ था। पूरी बिल्डिंग मे दो शौचालय थे जो कॉमन थे। सुबह जल्दी उठना पड़ता था ताकि लाइन ना लगना पड़े। साथ ही शौचालय जाम भी हो जाता था जिसे खुद ही साफ करना पड़ता था। उस वक्त मैं जहाँ था वहां दुर्गंध मे ऐसी लाखों जिंदगियां थी। मेरा रोजगार का सुरुआती दौर था जिसमे मैं ने करीब एक डेढ़ वर्ष गुजारे और फिर चेन्नई चला गया और वहां भी कमोवेश यही आलम था। हलांकि वहां सफाई थी और कमरे मे भीड़ कम थी परंतु एक या दो वाला फार्मूला वहां भी नही था। मुझे नही पता अब शायद चरित्र बदला होगा मकान का और शायद एक कमरे मे दो जना से अधिक नही रहने की परंपरा का विकास हुआ होगा। लेकिन मेरे कई रिश्तेदार मित्र आज भी एक कमरे मे पूरे परिवार के साथ जिंदगी गुजार रहे है। आज दिल्ली की आबादी काफी बढ़ी है परंतु मकान के बढ़ने का अनुपात का बहुत कम है। चेन्नई जैसे शहर जो उस समय काफी मंहगा हुआ करता था अब भी मंहगा ही है। फिर मधुबनी आगमन हुआ और शहर के भौआरा जैसे मुहल्ले गांव के कई घरों मे जाने का मौका मिला जहाँ दिल्ली और चेन्नई से भी बुरे हालात नजर आए। भौआरा का एक घर तो ऐसा मिला जहाँ एक कमरे मे 16 जना सोए हुए मिले। आप कहेंगे यह मुस्लिम गांव है इसलिए ऐसे मिले लेकिन कई हिन्दुओ के गांव मे भी रात को कंबल बांटने के दौरान यही दृश्य देखने को मिला। बेघर लोग दूसरे के घरों मे आश्रय लेते हुए मिले और ठिकाना महज कुछ फुट मे सिमटा हुआ नजर आया। आज अचानक वे लोग याद आने लगे जिनके लिए एक घर ही आशियाना है वे कहां से दो गज की दूरी मेंटेन करते होंगे। वे कौन सा हो कोरनटीन करते होंगे। सवाल बड़ा है क्या आज मौत के इस खौफनाक कहर मे उन्हे भी बाहर निकलने पर लाठी और गालियो के बदौलत सिखाया जाता है दो गज दूरी और मास्क है जरूरी को मेंटेन करे। सवाल यह भी है एक तरफ मौत का खौफनाक कहर है जो महज कुछ दिनो मे लोगो को अपने आगोश मे ले लेता है वही दूसरी ओर भूख दवाई पानी के मोहताज आम अवाम का क्या दोष है जिसकी सजा उन्हे मिल रही है? क्या भारत मे मजबूत प्रधानमंत्री मजबूत मुख्यमंत्री बनाने का यह सजा है जिसकी सजा उन्हे मौत के रूप मे दी जा रही है? आज हर राजनीतिक दल एक दूसरे पर दोष मढ़ कर निकल जाते है और आम जनता तिल तिल कर मरने को मजबूर है । सरकार को आज उन घरों मे झांकना चाहिए जहाँ पैर रखने की जगह नही है वहां कई जिंदगियां जीने को मजबूर है। क्या उन्हे सोशल डिस्टेंस की जरूरत है या फिर एक नॉर्मल जिंदगी की जिसे हर आजाद देश मे मिलता है?

यह लेख एक पत्रकार ने लिखे है जिनका यह विचार निजी है।

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