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अतिथि देवो भवः पुराना हो चुका है


तिथि देवो भवः ! हम बचपन से ही अतिथि को भगवान मानते आये है चाहे वह अतिथि मेरा हो या मेरे पडोसी का ! मुझे याद है मेरे पड़ोस में जब भी कोई मेहमान आता था तो बड़े बुजुर्ग कहते थे बेटा पड़ोस में मेहमान आया हुआ है ज्यादा सोर सराबा मत करो अन्यथा वे लोग क्या सोचेंगे ! हम इसी परंपरा को आज भी निभाते आये है ! लेकिन मुख्यमंत्री नितीश कुमार के साथ जो हुआ वह मिथिला के दृष्टिकोण से कतई अच्छा नहीं हुआ ! वे आज हमारे बिच हमारे मेहमान के रूप में आये थे और हमलोगो से कुछ बाते साझा करना चाहते थे लेकिन हमने उन्हें भला बुरा कहा ,उन्हें वापस जाने को कहा ! हो सकता है हमारा उनका सिद्धांत अलग अलग हो हमारे और उनके कार्य करने की शैली अलग हो लेकिन इसका यह अर्थ नहीं होता है की हम उन्हें बेइज्जती कर घर से निकल दे ! हम या क्यों भूल गए की वे बिहार के मुख्यमंत्री के हैसियत से मधुबनी आये हुए थे और बिहार के निवासी होने के नाते वे हमारे भी मुख्यमंत्री है ! हमने कई बार मुख्यमंत्री के संबोधन सूना है ! लेकिन वे आज जब बोल रहे थे तो उनके भाषण में वह ख़ुशी नजर नहीं आया जो उनके भाषण शैली में हुआ करता था ! वे आज मधुबनी को दो सौ चौबीस करोड़ तिरानवे लाख नब्बे हजार नौ सौ रूपये का सौगात लाये थे लेकिन बदले में हमने उन्हें क्या दिया विरोध ,काला झंडा ! सुबह हमने देखा था जीविका दीदी काफी उत्साह में थी ! मंच से लेकर मुख्यमंत्री के डी एरिया को वे अपने हाथों से सजायी थी ! महिलाये सुबह सुबह अपने घरों से निकलकर सभा स्थल तक पहुंच गयी और मुख्यमंत्री का घंटो इंतजार किया ! बिना किसी गीला सिकवा के वे मुख्यमंत्री के संबोधन को सुनी ! एक जीविका दीदी जो सरपंच भी है और किसी अन्य पार्टी से राजनीति करती है उन्होंने हमें रोककर कहा यह अच्छा नहीं हुआ ! वे हमें कुछ देने आये हुए थे ! रानी नाम की एक कलाकर है जिसने घंटो मुख्यमंत्री के स्वागत के लिए फूलों से रंगोली बनायीं थी बतायी भैया सब फीका पड़ गया !

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