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घोटाला का साइड इफ़ेक्ट ग्यारह वर्षो से परेशान है ग्रामीण


कहते है शादी का लड्डू जो खाये वह भी पछताए जो नहीं खाये वह भी पछताए कुछ इसी तरह की कहानी घोटाला मामले में भी दिखाई दे रहा है ! घोटाला पकड़ो तो वर्षो तक परेशानी उठाओ नहीं पकड़ो तो घटिया काम पाओ ! और कभी कभी घोटाला पकड़ना लोगों के लिए इतना मुसीबत बन जाता है की लोग कहने लगते है भैया ठीकेदार काम ठीक कर रहा था वो फलां नेताजी ने जबरन काम रुकवा दिया वर्ना काम हो गया रहता ! और अब तो इसीलिए नेताजी अक्सर आँखों के सामने भी घोटाला होते देखकर आँखे बंद कर लेते है ! लेकिन भैया नागदह के ग्रामीण ने यदि ग्यारह साल पहले आँखों पर पट्टी बाँध लिया होता तो इतना परेशानी नहीं उठाना पड़ता लेकिन नहीं ईमानदार बनना था तो लो लग गए ग्यारह साल और पता नहीं और कितने वर्षो में ग्रामीणों को इस मुसीबत से छुटकारा मिलेगा ! दरअसल मैं आपको घोटाल का साइड इफ़ेक्ट के बारे में बता रहा हु यह साइड इफ़ेक्ट घोटाला को पकड़ने के बाद सामने आया है ! मामला बेनीपट्टी प्रखंड के नागदह गाँव का है !
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नागदह और बलाइन गांव को जोड़ने के लिए एक पुल का जरुरत था सो पुल निगम ने लगभग 25 लाख की लागत से एक पुल का निर्माण कार्य भी सुरु कर दिया परन्तु इधर पुल बनना सुरु हुआ और उधर अनियमितता सुरु हो गया और कुछ युवा नेता को यह बात गवारा नहीं हुआ और मामले का शिकायत तत्कालीन जिला पदाधिकारी राहुल सिंह से कर दिया फिर क्या था जिला पदाधिकारी ने मामले का जांच किया और मामला सत्य पाया ! जिलापाधिकारी ने ठीकेदार जूनियर इंजीनियर ,एक्सक्युटिव इंजीनियर ,केसीयर पर संगीन धाराओं के तहत मामला दर्ज करने का आदेश दिया साथ ही एडवांस दिए गए पैसे वसूलने का भी आदेश दे दिया ! चोरी तो रुक गया साथ ही पुलिया का भी काम रुक गया ! यह पुलिया के नहीं बनने के कारण ग्रामीणों को एक गांव से दूसरे गांव जाने के लिए सात से आठ किलोमीटर का अधिक चक्कर काटना पड़ता है ! और लोगों का मज़बूरी है खेती का अधिकतर जमीन नदी के दूसरे तरफ है जिस कारण से उन्हें हर रोज परेशानी से रु ब रु होना पड़ता है ! कई बार विभाग के अधिकारी ने मामले का जांच भी किया पुल बनाने का आदेश भी दिया गया लेकिन हुआ वही ढाक के तीन पात वाली कहावत ! इंजिनियर और ठीकेदार को इस शर्त पर जमानत मिला था की तीन महीने में वे नया पुलिया बना दे लेकिन जमानत मिलने के बाद ना तो इंजिनियर साहब को पुलिया बनाने का फुर्सत मिला और ना ही ठीकेदार महोदय को और ना ही डीएम साहब को काम करवाने का फुर्सत मिला ! लेकिन एक बार फिर स्थानीय ग्रामीण जटाशंकर झा के पत्राचार के बाद मामला खुला है और विभाग के प्रधान सचिव ने स्थल का जांच किया है साथ ही विभाग को पुल बनाने का आदेश भी दिया है ,बस देखना बाकी है आखिर कब तक गाँव का यह अर्धनिर्मित पुलिया बन कर तैयार होगा ! 

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