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जनता द्रोपदी की तरह चिरहरण कराने के लिए कुरु सभा में मौजूद है ! जिसे देख तो सब रहे है ! लेकिन बचाने का कोई प्रयत्न नहीं कर रहा है


न्यूज़ डेस्क पटना 
दीक्षा रानी 
कुरु सभा तो याद होगा आपको, नहीं याद है तो महाभारत याद होगा और उस सभा में द्रोपदी का चीरहरण का प्रयास तो जरूर याद होगा ! दुर्योधन का अट्ठास मैं ने महाभारत के किताबों में पढ़ा था लेकिन आज भी वह अट्ठास मेरे कानो में सदैव गूंजता है, मैं जब भी शून्य को निहारता हूँ  तब यह सोचता हूँ आखिर वह कैसे मंत्री और संत्री थे जो महज नौकरी और कुछ सुविधाओं के लिए चुप्पी साध लिए थे ! सभी चुप और बिलकुल खामोस थे ! इस चीरहरण का सिर्फ एक महिला ने विरोध किया जिसके आँखों पर पट्टी थी ! उस विरोध में क्रोध कम था और याचना अधिक थी, हालांकि उस याचना ने तो एक महिला का लाज रख लिया था, लेकिन राज्य को विनाश होने से नहीं बचा पाई ! कहानी का आज जिक्र इसलिए करना जरुरी है क्योकि सरकार अट्ठास कर रही है जनता को कभी निजी अस्पताल वाले कभी जीएसटी वसूलने वाले कभी राशन किरासन वाले कभी भू माफिया चीरहरण करने को आतुर है ! नौकरशाह अपनी नौकरी बचाने के लिए जूझ रहे है ! सरकार अपनी पीठ थपथपाने में लगी है, खुद को ऊंचा दिखाने के लिए वे इस कदर आतुर है की गरीबों के निवाले का पैसा भी प्रचार प्रसार में खर्च करने से उन्हें गुरेज नहीं है ! सिर्फ मधुबनी जिला में सैकड़ो अस्पताल बिना लाइसेंस के चल रहे है और राज्य की बात करे तो ऐसे अस्पतालों की संख्या हजारों में पहुंच जायेगी ! वे लोग मजबूर और लाचार मरीजों के परिजनो से पैसे वसूलने में व्यस्त है लेकिन सरकार के नुमाइंदो को इतनी फुर्सत नहीं है की वे इन गरीब मजलूमों को इस चीरहरण से बचा पाएं ! सरकार सैकड़ो करोड़ रूपये स्वास्थ्य वजट पर खर्च करती है लेकिन महज दो कमरों में चलने वाली क्लिनिक जिसे कोई फर्जी डॉक्टर या कम्पाउंडर चलाता है उससे बेहतर सुविधा और स्वास्थ्य लाभ देती है ! सरकारी अस्पताल में मरीजों के साथ ऐसे वर्ताव किये जाते है जैसे कोई मुफ्तखोर जनता डॉक्टर से कुछ मांगने पहुंच गया है ! अस्पतालों का आलम यह है की कभी डॉक्टर तो कभी एम्बुलेंस तो नहीं मिलती कभी दवाई की किल्लत और भी हड़ताल जैसे परेशानियों से मरीज का रूबरू होना तो उनकी किस्मत बन गयी है ! हर जिले में चार से पांच दर्जन ऐसे डॉक्टर है जिनका कभी ट्रांसफर नहीं हुआ है और कभी हुआ भी है तो महज एक दो दिन के लिए हुआ है ! डॉक्टर और आमिर होते जा रहे है दवाई मंहगी होती जा रही है पर जनता का क्या ? उसे कौन देख रहा है ? उसका कौन सुन रहा है ? व्यापारी अभी तक जीएसटी का फार्मूला नहीं समझ पाए है और एक सामान पर दो से तीन बार जीएसटी वसूली जा रही है ! व्यापारी तो उस जीएसटी को रिटर्न भरकर वापस भी ले लेते है लेकिन जनता का क्या ? उन्हें कौन लौटा रहा है ? वे तो आज भी वहीं है ! ना तो उनका जीडीपी बढ़ा है और ना ही वे विकास की गंगा में तैर रहे है ! रासन किरासन से आम जनमानस को जरूर फायदा हुआ है लेकिन दुकानदार उन गरीबों को भी नहीं छोड़ रहे है ! दो रूपये किलो मिलने वाला चावल गेहूं को दुकानदार चार से छह रूपये तक बेच रहे है ! पचास किलो की जगह पैंतालीस किलो वजन थमाया जा रहा है ! ट्रको से रात के अँधेरे में चावल गेहू उतार कर कालाबाजारी किया जाता है और उसका भरपाई भी यही जनता उठा रही है ! इसे कौन रोकने वाला है ? जनता लाचार और बेबस की तरह देख और सुन रही है ! कभी सीओ के कार्यालय का चक्कर लगाए है यदि नहीं तो लगा आइये ! पदाधिकारी से लेकर कर्मचारी तक इतने व्यस्त मिलेंगे की आपको एक काम के लिए महीनों चक्कर काटने पड़ेंगे ! और आपको थक हार कर बिचौलिये या भू माफिया से सेटलमेंट करने के अलावा कोई चारा नहीं मिलेगा ! कुछ हद तक पुलिस डिपार्टमेंट ट्रांसपेरेंट हुआ है लेकिन उसमे अभी बहुत कुछ सुधार की जरुरत है ! पुलिस को जनता की महत्वा को समझना जरुरी है !
इसमें लेखक के निजी है विचार madhubanimidea.com ने इस लेख को सीधा प्रकाशित किया है 

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